संस्मरण
संस्मरण विशेषांक
विषय - उन आंसुओ की दुआओं ने मुझको भी रुला दिया
बात उन दिनों की है जब मै बी.ए. की पढ़ाई कर रहा था । एक दिन सुबह सुबह मै अपने निजी काम से बैंक में जाने को हुआ वैसे बैंक 10 बजे खुलता है यह भी पता था मुझे पर मै थोड़ा जल्दी ही घर से निकल गया । वहाँ जैसे ही मै पहुंचा कुछ आदमी और औरतें जो किसी दूर गाँव से आये थे बैठे हुए थे । उनकी कुछ आपसी बातों से मुझे पता चला कि वो जहाँ से आये थे वहाँ आने की सुबह एक मात्र जीप जल्दी ही आती है इस कारण वो उससे जल्दी ही आ गये ।। उन लोगों में दो औरतें बेचारी मुझे ज्यादा दुःखी लग रही थी तथा मेरा भी मन हुआ उनसे बातें करने का , क्योंकि मुझे हमेशा दूसरों के दुख से बहुत हमदर्दी रही है और मै दुःखी भी होता हूँ उनका दुख जानकर ।।
हाँ तो मै बता रहा था वहाँ दो औरतें ज्यादा दुखी जान पड़ रही तो मैने उनसे बातचीत शुरु की तो एक महिला ने बताया कि क्या बताऊं जिंदगी देकर ऊपर वाले ने जमाने भर का दुःख दे दिया ।। घर में खाने का दाना भी नही रहने देता मेरा पति ,रोज शराब में डूबा रहता है सुबह से शाम ।। जो मै दूसरों के यहाँ कमा कर लाती हूँ वो जबरदस्ती छीन लेता है अगर नही देती हूँ तो बहुत मारता है । मेरी आँखे भर आई बेचारी इसकी उम्र तो साठ के ऊपर है ये कैसे मार सहन करती होगी । दूसरी कहनी लगी कि मेरा तो पति और औलाद दोनों ही बहुत ज्यादा मुझे मारते है ।। दोनों जमकर शराब पीते है और दिनभर घर पर पड़े रहकर खटिया तोड़ते रहते है और मेरे हाथ पैर तोड़ रखे है , जिसके कारण अब तो काम भी नही होता मुझसे लेकिन काम नही करूँ तो खाये क्या और किनके भरोसे रहे, हाँ नरेगा काम से थोड़े से पैसे बैंक में आ जाते है उन्ही पैसो को निकालकर कुछ राशन का सामान लेनी आई हूँ ।।
उनकी कहानी सुनकर मुझे ऐसे निरीह पशु समान इंसानों पर बहुत गुस्सा आया मगर क्या कर सकता था वो कहाँ मै कहाँ । मैने कहा थाने में रिपोर्ट लिखवा देना चाहिए ऐसे आदमियों की तो , पर वो बोली बेटा वो चाहे कुछ भी करें है तो हमारे ही । मुझे बहुत खीझ महसूस हुई । आखिर किस लिए ये रिश्तों का अब भी लिहाज कर रही है जबकि वो इस लायक नही है ,लेकिन नारी के विशाल हृदय को आज दिन तक कोई समझ नही पाया ।। उन दोनों औरतों में पता नही मुझे अपनी माँ दिखने लगी थी उस समय ,भोला सा चेहरा झूठ फरेब से कोसों दूर ।। अभी बैंक खुलने में समय था क्योंकि आज सोमवार था तो बैंक कर्मचारी देरी से आऐंगे ऐसा बोला गया ।। तब वो दोनों ऐसे ही बातें करने लगी तो मुझे पता चला कि वो दोनों भूखी है और यहाँ उनके पास कुछ है भी नही जिससे कुछ खा ले , मै उनका दुःख बर्दास्त न कर सका और पास की दुकान से उनको खाने के लिए कचोरी और समोसे ले आया और बड़े प्यार से उन्हे खाने को दे दिया ।। मेरा ऐसा पुत्र प्रेम देखकर वो गदगद हो आँखों में आँसू भरकर रोने लगी और मुझे जुग जुग जिओ की असीम दुआओं के साथ मेरे सर पर हाथ फेरने लगी ।। उनका स्पर्श पा मैने स्वर्ग पा लिया हो ऐसा अनुभव किया ।। मुझे जो खुशी हुई उसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल था शायद कोई भी उस खुशी का अंदाजा नही लगा पाता ।। आज भी उन माता रूपी औरतों की दुआओं को जब जब याद करता हूँ मेरे भी आँसू आ जाते है ।। आज उनकी दुआओं से मै सरकारी नौकरी कर रहा हूँ और सपरिवार खुश हूँ ।।
मौलिक एवं स्वरचित आत्माभिव्यक्ति जो सत्य घटना पर आधारित है ।।
