ध्यान
नमस्कार,
मैं दीपिका केसकर हूँ ।
आज यहाँ बोलने की मेरी इच्छा यूँ ही नहीं जागी, इसके पीछे मेरे जीवन की एक शांत लेकिन गहरी क्रांति छुपी है।
मेरे जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था — ध्यान।
वो भी रोज़-रोज़ किया गया ध्यान।
अब आप सोच सकते हैं — “ध्यान ही तो है, इसमें नया क्या?”
मैं भी यही सोचती थी।
लेकिन जब ध्यान जीवन में उतरता है, तो वह सिर्फ़ एक क्रिया नहीं रहता — वह अनुभव बन जाता है।
ध्यान से मुझे अलग-अलग अनुभूतियाँ मिलीं, लोग जुड़े, रिश्ते बदले और सबसे बड़ी बात — जीवन को देखने की दृष्टि बदल गई।
मैं पहले भी ध्यान करती थी, लेकिन जब से मैं पिरामिड ध्यान केंद्र से जुड़ी, तब से लगा जैसे उस ध्यान की शक्ति तीन गुना बढ़ गई हो।
यहाँ सीनियर मास्टर्स समय-समय पर मार्गदर्शन करते हैं, लेकिन सबसे सुंदर बात यह है कि यहाँ कोई यह नहीं कहता —
“मैं कह रहा हूँ इसलिए मानो।”
बल्कि कहा जाता है — “अगर सही लगे तो अपनाओ, नहीं तो छोड़ दो।”
कितनी अहिंसा है इसमें — यहाँ विचार भी ज़बरदस्ती नहीं थोपे जाते।
बचपन से हम सुनते आए हैं —
“ध्यान से पढ़ो”, “ध्यान से खेलो”
लेकिन यह “ध्यान ” आखिर है क्या?
इसका असली अर्थ मुझे ध्यान करने से समझ आया।
तब एहसास हुआ कि ध्यान तो हमारे जीवन की हर साँस में पहले से ही मौजूद है।
भगवान बुद्धने 2500 वर्षों पहिले ये ध्यान विधि पुनर्जीवितकी और ब्रह्मर्षि पितामह सुभाष पत्रीजी इस ध्यान विधि को एक अत्यंत सरल कर के बताया ताकि सब तक ये पोच पाए—
आनापानसति।
आना (अन्): साँस लेना (Inhalation).
अपान : साँस छोड़ना,
और सति यानी साथ रहना।
अब सवाल उठता है — हमारे साथ हमेशा कौन रहता है?
उत्तर है — हमारी साँस।
जन्म के समय सबसे पहले वही हमारे साथ होती है और मृत्यु के समय सबसे अंत में वही हमें छोड़ती है।
हम क्या कर रहे हैं, क्या सोच रहे हैं — सब की साक्षी वही है।
इसीलिए पत्रीजी कहते हैं — साँस ही हमारी गुरु है।
पत्रीजी आगे कहते हैं —
“आपकी नाक ही आपका पिरामिड है।”
उन्होंने पिरामिड पर अनगिनत प्रयोग किए, एक लाख से अधिक किताबें पढ़ीं और उनमें से चुनिंदा विकल्प हमें दिया जैसे -- you forever, Mind Waves ताकि हमारा समय बचे और जीवन आसान बने।
PSSM — (Pyramid Spiritual Society Movement) जो पत्रीजिनकी शिक्षाएँ आगे चलाते है।
तीन सरल लेकिन गहरी बातों पर ज़ोर देता है —
ध्यान करो
पुस्तकें पढ़ो
अनुभव साझा करो
अनुभव साझा करने से मेरा आत्मविश्वास कई गुना बढ़ा।
मुझे एक ऐसी आध्यात्मिक फैमिली मिली जहाँ है —
No Judgement, No Interference, No Complaint
इन्हीं सिद्धांतों पर यह परिवार चलता है, और इसी से आपसी बॉन्डिंग और मजबूत होती है।
ध्यान से एक और अद्भुत समझ आई —
जीवन भावनाओं का सामूहिक संग्रह है।
और ये भावनाएँ आती हैं हमारी पाँच इंद्रियों से —
आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा।
यही पाँच इंद्रियाँ हमारी आत्मा को भोजन देती है।
जब इनका सही उपयोग होता है, तो भावनाएँ संतुलित रहती हैं, विचार पवित्र होते हैं और ध्यान गहराता है।
इसलिए हम क्या देखते हैं, क्या सुनते हैं, क्या बोलते हैं और क्या खाते हैं — यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आज मैं पूरे विश्वास से कह सकती हूँ —
ध्यान हमारी आत्मा का भोजन है।
जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो लगता है —
ध्यान ने मुझे मुझसे ही मिला दिया।
राम हमेशा मेरे पास खड़े थे, मुझसे बात कर रहे थे —
लेकिन मैं सुन नहीं पा रही थी, क्योंकि मैं लगातार भाग रही थी, बाहर के शोर से भरी हुई थी, लोगोंके विचार सुन रही थी।
जब ध्यान जीवन में आया, तो विचार साफ़ हुए, खुद के विचार कौनसे समाज मैं आए, खुद से प्रेम बढ़ा और खुद से दोस्ती हो गई।
इसका असर मेरे रिश्तों पर भी पड़ा —
मैंने छोड़ना सीखा, ज़्यादा हँसना सीखा।
अब कोई कुछ कहे तो बुरा नहीं लगता, क्योंकि समझ आ गया है —
जो दूसरों के बारे में बुरा बोलते हैं, उन्हें अभी खुद से प्यार करना सीखना बाकी है।
और कभी हम भी वैसे ही थे — यह स्वीकार करने का साहस भी ध्यान ने दिया।
“Your Soul’s Gift”
इस पुस्तक ने मुझे जीवन को 360 डिग्री से देखना सिखाया।
जो राम पहले कंधे के पास खड़े थे, वे धीरे-धीरे दिल में आकर बैठ गए।
तब समझ आया —
Our body is our temple.
किताबें पढ़ने से जीवन की समझ बढ़ी और आध्यात्मिक परिवार के साथ चर्चा करने से सुनने की कला आई।
तभी तो कहा गया है —
“Books are Gurus”
“पुस्तकें हाथों के सच्चे आभूषण हैं”
“पढ़ोगे तो ही बढ़ोगे”
निकोलस टेस्ला कहते हैं —
“If you wish to understand the universe, think in terms of energy, frequency and vibration.”
ध्यान से हम अपनी ऊर्जा बढ़ा सकते हैं, ब्रह्मांड और ईश्वर को समझ सकते हैं —
वो भी अपने घर बैठे।
बस अपनी साँस पर ध्यान रखकर।
आनापानसति ध्यान कैसे करें?
बहुत सरल है —
आँखें बंद करें।
सुखासन में ज़मीन पर या कुर्सी पर बैठें।
पैरों की एड़ियाँ मिलाएँ।
एक हाथ की उँगलियाँ दूसरे हाथ की उँगलियों में फँसाएँ, हथेलियाँ आकाश की ओर रखें।
और आने-जाने वाली साँस को देखें — वही आपकी गुरु है।
चाहें तो हल्का वाद्य संगीत या प्रकृति की ध्वनियाँ रख सकते हैं, लेकिन ध्यान सिर्फ़ साँस पर ही रहे।
ध्यान कितनी देर करें?
जितनी आपकी उम्र है — उतने मिनट।
35 साल की उम्र है, तो 35 मिनट।
रोज़ करें।
ये ध्यान कोई भी, कहा पर भी, किसी भी टाइम कर सकता है।
40 दिन लगातार ध्यान करने से शरीर की 72,000 नाड़ियाँ शुद्ध होने लगती हैं।
कॉस्मिक ऊर्जा मिलती है, उत्साह बना रहता है, नींद कम लेकिन गहरी हो जाती है।
पिरामिड कैप का उपयोग करें तो ऊर्जा तीन गुना बढ़ जाती है।
लेकिन 40 दिन बाद रुकना नहीं — ध्यान को जीवन बना लेना है।
सोचिए —
सिर्फ़ आँखें बंद करने से इतना कुछ बदल सकता है।
तो फिर…
ध्यान करेंगे ना अब? 😊

