अंधभक्त
दोस्तों इस लेख का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं अपितु जागरूक करना है । तो पढ़े और आनंद ले । जैसा कि हम सब जानते है कि आजकल एक नया जीव बहुत तेजी से पनप रहा है—नाम है अंधभक्त। यह प्राणी दिखने में बिल्कुल आम इंसान जैसा होता है, लेकिन इसकी एक खास पहचान है—इसकी आँखें हमेशा बंद रहती हैं, और आवाज़ हमेशा ऊँची।
अंधभक्त का जन्म तब होता है जब इंसान अपनी सोच को ताला लगाकर किसी एक व्यक्ति, विचार या पार्टी के चरणों में रख देता है। इसके बाद वह हर चीज़ को एक ही चश्मे से देखने लगता है—भले ही वह चश्मा काला हो, टूटा हुआ हो या फिर बिल्कुल ही नकली क्यों न हो।
अंधभक्त की सबसे बड़ी खूबी है—तर्क से दूरी। अगर आप उससे कोई सवाल पूछ लें, तो वह जवाब नहीं देता, बल्कि सवाल पूछने वाले की ही नीयत पर सवाल उठा देता है। जैसे ही आप कहें, “भाई, इसमें गलती है,” वह तुरंत कहेगा, “तुम देशद्रोही हो!”
अब भला गलती और देशद्रोह का क्या संबंध है, यह तो अंधभक्त ही जाने।
सोशल मीडिया अंधभक्तों का पसंदीदा अखाड़ा है। यहाँ वे दिन-रात युद्ध करते हैं—तथ्यों से नहीं, बल्कि फॉरवर्ड किए गए संदेशों से। अगर कोई खबर उनके विश्वास के खिलाफ हो, तो वह “फेक न्यूज़” घोषित कर दी जाती है। और अगर वही खबर उनके पक्ष में हो, तो वह “राष्ट्रहित में सत्य” बन जाती है।
अंधभक्त का एक और अद्भुत गुण है—नेता कभी गलत नहीं हो सकता। चाहे नेता कुछ भी कहे या करे, अंधभक्त उसके पीछे ऐसा खड़ा रहता है जैसे परछाईं। अगर नेता बारिश को धूप कह दे, तो अंधभक्त छाता लेकर धूप सेंकने निकल पड़ेगा।
घर-परिवार में भी अंधभक्त का प्रभाव कम नहीं है। चाय की मेज पर चर्चा शुरू होते ही वह अपने विचारों का बम फोड़ देता है। अगर किसी ने असहमति जताई, तो माहौल ऐसा हो जाता है जैसे महाभारत का युद्ध छिड़ गया हो—बस फर्क इतना है कि यहाँ अर्जुन और कौरव दोनों ही वही एक व्यक्ति होता है।
लेकिन इस कहानी का सबसे मज़ेदार और दुखद पहलू यह है कि अंधभक्त को खुद पता ही नहीं होता कि वह अंधभक्त है। उसे लगता है कि वही सबसे बड़ा देशभक्त, सबसे बड़ा ज्ञानी और सबसे बड़ा सच्चा इंसान है। बाकी सब लोग बस “भटके हुए” हैं।
आखिर में सवाल यह नहीं है कि अंधभक्त कौन है, सवाल यह है कि क्या हम खुद कहीं उस राह पर तो नहीं बढ़ रहे? क्योंकि अंधभक्ति का वायरस बहुत तेज़ी से फैलता है—और इसका कोई वैक्सीन नहीं है, सिवाय एक चीज़ के—खुली आँखें और खुला दिमाग।
तो अगली बार जब आप किसी बात पर बिना सोचे-समझे “हाँ में हाँ” मिलाने लगें, तो ज़रा ठहरिए… कहीं आप भी अंधभक्त बनने की ट्रेन में तो नहीं चढ़ गए?
— क्योंकि असली भक्ति में आँखें बंद नहीं, दिमाग खुला होना चाहिए।
