बस यूं ही कुछ लिख जाती हूं
छोटी इ की मात्रा लगनी है या बड़ी ई की मात्रा यह समझ नहीं पाती हूं,
बड़े ऊ की मात्रा और छोटे उ की मात्रा को देखकर मैं सोच में पड़ जाती हूं,
चंद्रबिंदु और अंग की मात्रा मे भेद नहीं बता पाती हूं ,
परंतु बस यूं ही मैं हिंदी में लिख जाती हूं।
उद्धरण चीन्ह की क्या विवशता है?
हम अपनी बात स्वयं कह रहे क्या यह काफी नहीं
आखिर इसे लगाने की क्या आवश्यकता है?
जब हम प्रश्न पूछ ही चुके हैं तो प्रश्नवाचक चिन्ह को साथ लगाने से आखिर क्या हो जाएगा?
हलंत और विसर्ग की समझदारी को कौन समझाएगा ?
नियम बड़े सारे हैं पर भावनाओं को व्यक्त करना ख्वाब हमारे हैं।
इतनी अशुद्धियां और विसंगतियां मुझमें होते हुए भी, बस यूं ही मैं हिंदी में कुछ लिख जाती हूं और फिर एक दिन अचानक मैं हिंदी की लेखक बन जाती हूं।
शुद्ध हिंदी में कुछ लिख पाऊं यही आशा है और एक दिन में अच्छी लेखक बन जाऊं बस यही अभिलाषा है।
बात समझ में आई क्या ? क्यों हिंदुस्तान में हरकोई गिटपिट करता है,
अब कौन लगाए बिंदी महावर, उनके लिए तो जींस पैंट ही भला है।
मेरी प्यारी हिंदी जी, क्योंकि वह तुमसे नहीं तुम्हारे सोलह श्रृंगार से जो डरता है।
