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मौसम और मन



बाहर बरखा की बूंदें दौड़ लगा रही थी, बादल के डाँट की गड़गड़ाहट से डरकर धरती की ओर भाग रही थी। सच में बादल की डाँट से कौन नहीं डरता, हम इंसान भी कई बार घबरा जाते हैं, तो ये नन्हीं सी बूंदें कैसे ना डरें!
मन किया बाहर जाकर बूंदों से, जलधारा से मिल आऊँ, पर उनका वेग और तीव्रता देख विचार बदल दिया। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे; प्रेम और लड़ाई दूर से देखें तो अच्छी लगती है। जैसे प्रेम कथाएं सुनना देखना तो रुचिकर है, पर महसूस करना दुष्कर, वैसे ही लड़ाई भी करनी पड़े तो दुखदायी।
कुछ ऐसा ही हाल इस मौसम में भी होता है। अंदर बैठकर बारिश का आनंद लेना जितना सुखकर और शीतलता देता है, उतनी ही खिन्नता पानी से भरे गड्ढों से गुज़रने में होती है।
पहली बारिश तो सौंधी महक लाती है, पर बाद में नमी बेचैनी दे जाती है। ये सावन की खुशी उन्हें ही भली प्रकार महसूस होती है, जिनके पास पक्का सुविधायुक्त निलय है, अन्यथा खपरे से टपकती बूंदें सोना खाना दुश्वार कर देती हैं।
बारिश में भीगने को रोमांचक दिखाने वाले, आम आदमी को कल्पना का आनंदमयी संसार भ्रमण करवाते हैं। क्योंकि जिनके घर ही डूबे हों उन्हे बाहर जाकर भीगने की क्या आवश्यकता!?
खैर, भीषण ग्रीष्म से तप चुकी इस धरा को वर्षा की अत्यावश्यकता तो है ही, और जल ही जीवन है।
हर परिस्थित, हर क्षण में आनंद और सुख की तलाश ही जीवन है।
बाकि मौसम और मन का क्या, बदलना तो इनकी फितरत ही है...

डॉ निशी मंजवानी ✍️

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