रील भक्त
हम भूल गए हैं वर्तमान में जीना, इस क्षण में जीना। हम कैद कर लेना चाहते हैं हर लम्हे को,ये जानते हुए भी कि समय किसी के हाथ में अधिक नहीं रहता, फिर भी हम उसे कैमरे की मदद से रोकना चाहते हैं!
लेकिन जिस वक्त को हमने कैमरे से रोकने की कोशिश की है क्या हम उसे पलट कर दोबारा देखते हैं? शायद ही कभी। लेकिन यही अगर हम उस लम्हे में जी लें तो कितनी यादें बन सकती हैं। क्योंकि मानव मस्तिष्क से कुछ भी मिट सकना असंभव हैं।
लेकिन आज हम हर पर्यटन स्थल या धार्मिक स्थलों पर देखें तो भक्तों से अधिक दर्शनार्थियों की भीड़ होती है। जो स्वयं तो कम परंतु सोशल मीडिया से लोगों को अवश्य दिखाना चाहते हैं। इनमें से अधिकांश का उद्देश्य तो हम भली भाँति समझते हैं।
सवाल यह हैं कि हम मंदिर क्यों जाते हैं? क्योंकि वहां का भक्तिमय वातावरण मन को शांत करता है। हम वहाँ कुछ देर बैठकर अपने चित्त को एकाग्र करने का प्रयास करते हैं, भगवान से जुड़ने का प्रयास करते हैं। परंतु यदि उन्हीं भगवान के दर्शन हेतु हमें भीड़ से लड़ना जूझना पड़े, तो क्या यह धार्मिक यात्रा सफल कहलायी? क्या इस तरह दर्शन कर हमें पुण्य की प्राप्ति हो गई?
भगवान तो ध्यान से मिलते हैं, हर क्षण उनका स्मरण ही हमें उनके निकट ले जाता है। लेकिन कुछ आधुनिक लोग देखकर यह समझ पाना मुश्किल है कि वे भगवान के भक्त हैं या 'रील भक्त'!
चलिए मुद्दे पर आते हैं।
बात तो यह है कि जहां मन की आँखों का काम है वहाँ कैमरे की आँखें क्यों लगाना!? यदि दर्शन से नैनों की तृष्णा तृप्त होती है तो दर्शन कीजिए, वीडियो क्यों बनाना? इन वीडियोग्राफरों और रीलमेकरों की वजह से वास्तव में जो 'भक्त' हैं, उन्हें असुविधा होती है। अकारण भीड़ से धक्का मुक्की और भगदड़ वाला माहौल बन जाता है और प्रायः खबरें सुनने आती है कि संख्या में लोग चोटिल घायल हो गए। इस तरह के हालात किसी विशेष अवसर पर अवश्य देखने को मिलते हैं।
क्या यह आचरण सही है? इन व्यवस्था बिगाड़ने वालों में हर उम्र के लोग शामिल हैं। क्योंकि आज युवा से लेकर अधेड़ उम्र तक के लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं। ऐसे में क्या कदम उठाए जाएं कि मंदिरों में भक्तगण बिना किसी रुकावट के दर्शन का लाभ उठा सकें और असल भक्त अपने गंतव्य तक पहुँच सकें। यदि अड़चन उत्पन्न करने वाले हममें से ही हैं तो समाधान भी हमें ही निकालना होगा।
