विदुषी का जीना आसान नहीं होता
एक विदुषी का जीना आसान नहीं होता।
वो सही गलत को जानती है,
किसी के भी हां में हां नहीं मिला पाती,
बात को तर्कों पर कसती है,
इसलिए कई बार हंसी का पात्र बनती है,
रूढ़िग्रस्त समाजों में मान नहीं होता।।
एक विदुषी का जीना............................
गंगा,धरती, गृह लक्ष्मी की पदवी प्राप्त,
वो अवैतनिक दासी नहीं बन पाती,
निभृत एकांत में उसकी जागृत चेतना...
अपने अस्तित्व को टटोलती हुईं छटपटाती है किन्तु,
किसी को उसकी वेदना का भान नहीं होता ।।
एक विदुषी का जीना..................................
छोटी चादरों में भी घुटने,
पेट में डालकर सोती है।
निज पंखों को कुतरकर ,
कुटुंबियों के पंखों को संवारती है।
कभी कभी स्वयं के होने का कीड़ा,
उसके भीतर भी कुलबुलाता है,
मौन पलको पर अनगिन प्रश्न चिपक जाता है।
यदि पी गई प्रश्नों को तो पीते पीते...
किसी दिन अर्रा के गिर जाती है,
और पूछ लिया तो तूफान है आ जाता।।
एक विदुषी का जीना.......................
आत्म विकासोन्मुख......
इन्द्रिय प्राण बुद्धि तक पहुंची,
उस चितेरी को, पुनः पशुता के धरातल (आहार,निद्रा,भय,मैथुन)
पर खींचा जाता है।
उसकी बौद्धिकता से आक्रांत,
रूढ़िवादी महारथियों द्वारा घेरकर,
अभिमन्यु सा बध किया जाता है।
अथवा निष्कासन या परित्याग किन्तु;
लवकुश की शक्ति और पार्थ के गांडीव का,
किसी को ध्यान नहीं होता ।।
एक विदुषी का जीना ...........
गीता सिंह "शंभुसुता"
प्रयागराज
