सांझा बेला कड़ी दुपहरी,डगर निहारे बाबू जी
हिंदी दिवस पर एक कविता
मल मल के हैं खूब नहाए बदन निखारे बाबू जी,
मन प्रक्षालन कभी किए क्या जनम सुधारे बाबू जी ।।
जोगी बाना तन पे धारे,बने फिरे हो सन्यासी,
भोगी और विलासी काया कभी बिसारे बाबू जी।।
गरम तवे पर चढ़ कर ही लोई रोटी बन जाती है,
अब कनपट्टी दिखे सफेदी बाल संवारे बाबू जी ।।
भजन करे से पेट भरे ना जतन कोई तो करना होगा,
बेटा खाट जवानी तोरे फसल निहारे बाबू जी ।।
चकती प्योना जोड़ लगाके सारा मौसम बिता दिए,
बटुआ खुसा रहा टेटी में सरग सिधारे बाबू जी ।।
बैठक की को शान कभी थे एक किनारे पड़े हुए,
तनहाई में राम भरोसे वक़्त गुजारे बाबू जी ।।
सारा जीवन व्यर्थ गवाया इक भी पेड़ नहीं लगाया,
सांझा बेला कड़ी दुपहरी डगर निहारे बाबू जी ।।
गीता सिंह "शम्भु सुता"
प्रयागराज
