और बुढ़ापा कैसा हो
और बुढ़ापा कैसा हो बहुत डरते हैं ना हम लोग
चलो खुद से ही शुरुआत करते हैं कि हमारा बुढ़ापा कैसा हो
उम्मीद क्यों लगाए हम?
कि हमारा बुढ़ापा ऐसा हो
मैं तो कहती हूं जैसा भी हूं खास हो बस
आज दांत में बहुत दर्द था निकलवा आई
एहसास हो रहा था बिना दातों के बुढ़ापे में कैसे खाया जाता होगा
डर लग रहा है कि ऐसे ही करते एक एक दांत सब चले जाएंगे
पर खुशी है बहुत जब आए थे दांत एक-एक करके और हम शीशे में खुद को देखते थे जीभ लगाने से डरते थे आज वही मेरे व्यस्क दांत के जाने पर बार-बार खोखले पन को छू रही है
आंखों की रोशनी भी कम हो जाएगी
सोचती हूं देख तो ली दुनिया अपनी
अभी और क्या देखना बाकी है
सब कुछ तो देख चुके लोगों का वह प्यार दिखावा
और फिर बीच रास्ते में ठुकरा कर चला जाना
लोगों का दिखावा... हंसी आती है आप सबसे
हां कुछ सच में अपने लोग थे
जो हमेशा अपने ही रहे
फिर सोचती हूं के हाथ पैर भी चलना बंद हो जाएंगे
सोचो अगर बुढ़ापे में भी हाथ पर चलते तो जवान काम करना बंद कर देते लेकिन जवान लेकर भी हम क्या करते?
पैसों की कीमत जानती हूं?
रोटी की अहमियत जानती हूं?
औरत की इज्जत क्या होती है जानती हूं?
बच्चों की टेंशन क्या होती है जानती हूं?
फिर और क्या जिंदगी के बारे में जानना काफी*""
हां एक और बात जानते हो कि जिंदगी का सबसे बड़ा सच मृत्यु भी है
देखिए सामने से मां को जाते हुए
तो मेरे दोस्त एक दांत के गिरने पर कभी यह मत सोचना कि बुढ़ापे से डर लगता है।
जो पूरी जिंदगी अकेले और संघर्ष के साथ जी हूं तो बुढ़ापा भी कट जाएगा उस से क्या डरना
