अब तो भेंड बकरियां भी असुरक्षित हैं
नशे कि रात है,धुंआ बेशुमार है,
पहरुओं साव धान रहना ।
आज ही नहीं समय सदा से बीमार रहा है,
और समाज लाचार,
बस मुट्ठी भर लोगों पर ही,
मशालें जलाने का भार है।
पहरूओं साव धान रहना ।।
स्त्रियां तो कभी नहीं सुरक्षित थीं,
परन्तु ,आज तो भेड़ बकरियां भी असुरक्षित हैं,
वो चारागाह जाने से डरती हैं,
काला कपड़ा धारी दो आंखें घूरती हैं।
पहरुओ साव धान रहना।।
कब्रों से निकल कर मुर्दे बंदूक चलाते हैं,
बस्तियों की बस्तियां जलाते हैं,
नकाबपोशों की साज़िश तुम्हे करना बेकार है।
पहरूओ सावधान रहना ।।
नगर महानगर धुंए में उड़ते जा रहे हैं,
कल गली चौराहे और परसों,
गांव चौबारे भी उड़ेंगे,
खून में सने दुपट्टे चीखेंगे,
आधी रातों को जले शव डालेंगे,
कुहरे में डूबा सारा संसार है।
पाहरुओ सावधान रहना,
ये धुंए की रात है ,नशा बेशुमार है।
गीता सिंह "शंभु सुता"
प्रयागराज
