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कई जन्मों का रिश्ता है

कई जन्मों का रिश्ता है मिटेगा भाव भी कैसे,

मेरे हारिल की लकड़ी से मेरा अलगाव भी कैसे ।।

 

वो साज़िश कर रहे हैं देश के देखो ख़िलाफत में,

हवा नफ़रत को देते हैं चढ़ाए ताव भी कैसे ।।

 

दिखाने से न कुछ होगा कोई मरहम न रखेगा,

खुला छोड़ो न ज़ख्मों को भरेगा घाव भी कैसे ।।

 

जगाते हैं जो सोया है जगे को क्या जगाओगे,

पड़ी है भांग कूंए में तो हो बदलाव भी कैसे ।।

 

किसी बन्धन को अब तक जो तवज्जो से नहीं पाया,

मुसलसल शौक चलने का मिले ठहराव भी कैसे ।।

 

गीता सिंह "शंभु सुता"

प्रयागराज

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