ढलने लगे हैं दिन
बीमार धूप लगती गलने लगे हैं दिन,
जल्दी ही आजकल तो ढलने लगे है दिन ।।
बांहों का हार लेके जब सुबह झांकती थी,
महवे खयाले यार में उड़ने लगे हैं दिन ।।
आकर चली गई वो पर तुम नहीं आए,
कितनी उदास शाम है चुभने लगे हैं दिन ।।
कतरे पिघल के उम्र के गिरते हैं ताल में,
जीवन है बर्फ पानी छलने लगे हैं दिन ।।
क्या क्या भला संभालू कुछ रोज खो रहा है,
अंजुरी में भरी रेत सा झरने लगे हैं दिन ।।
ढहती हुई इमारत आले पे सभ्यता,
अब ओढ़ें क्या बिछाएं कहने लगे हैं दिन ।।
माथे पे सलवटें और गर्दन में शिकन हैं,
जल जल के दुपहरी में पकने लगे हैं दिन ।।
चंदन छिड़क छिड़क के इस बदन को संवारा,
मरघट पे घास फूस सा जलने लगे हैं दिन ।।
गीता सिंह "शंभु सुता"
प्रयागराज
