छत पे आती नहीं ज़िंदगी इन दिनों
छत पे आती नहीं ज़िंदगी इन दिनों,
मुझसे होती नहीं शायरी इन दिनों ।।
एक ही डाल पे फल लगे साथ मे,
भाई भाई मे है दुश्मनी इन दिनों ।।
फस्लेबारां में सूखा मचा ही रहा,
बादलों ने है की बेरुखी इन दिनों ।।
डाल चारा छिपा है शिकारी कहीं,
बाग़ में तितलियों की कमी इन दिनों ।।
उठ रहा है धुंआ आग होगी कहीं,
शाम की आंख में है नमी इन दिनों ।।
लग रही है मुझे धूप रूठी हुई,
बर्फ दिखती मुझे है जमी इन दिनों ।।
गीता सिंह "शंभुसुता"
प्रयागराज
