ओजपूर्ण कविता
पुर्णिका – महाकाल बनके |
देश के दुश्मनों पर भूचाल बनके हम बरसेंगे|
किया प्रहार बैरी महाकाल बनके हम गरजेंगे |
किसकी मजाल रक्त रंजीत हमारी धरती करे |
दो बूंद पानी को तरसे हलाल जमके हम करेंगे |
बहे बसंती बयार चम चम चमके तलवार यहाँ |
गंगा की धरती पराग खुशहाल बनके महकेंगे |
बचा ना कोइ राणा की भाला चौहान के वार से |
बन झांसी की ज्वाला अकाल बनके हम बहकेंगे |
भगत सिंह की गोली आजाद सा जाबांज है हम |
रक्षा धरती की खातिर मिशाल बनके हम चहकेंगे |
छप्पन इंची छाती बिन बंदूक बारूद बम गोला है|
कसम भारती हिन्द रक्षा त्रिकाल बनके हम निपटेंगे |
श्याम कुँवर भारती
बोकारो ,झारखंड
