मकर संक्रांति
सूरज मौन गति से धीरे-धीरे चल रहा है
बिना कुछ कहे, बिना कुछ सुने
कर्तव्य पथ पर चलता ही जा रहा है
सूरज दक्षिणायन से उत्तरायण में आ गया
मन को साथ धरा को उष्मा दे रहा है
ना जाने कितने युग सूरज ने देखें
और आगे भी देखता रहेगा
हर परिवर्तन का गवाह रहेगा
सूरज धीरे-धीरे मौन गति से चल रहा है।
अनीता चेची, मौलिक रचना
