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दोहरी

मैं बदलना चाहती थी
दोहरे मापदंड,दोहरी मानसिकता,
दोहरे चरित्र और भी बहुत कुछ..जो
आमतौर पर इंसानों के भीतर छिपा होता है।
मैं स्त्री हूं और चाहती हूं कि
अगर यह नहीं बदल पाऊं तो फिर क्यों नहीं
स्वयं बदल जाऊं।
जीऊं मैं भी दोहरा व्यक्तित्व
औरों की तरह,भीतर कुछ बाहर कुछ।
जीवन में सफल और विजयी होना ही
सर्वोच्च सम्मान है सबके लिए तो
मैं आज सफल और विजयी हूं।
स्नेह,ममता,दुलार,प्रेम के पोषण के साथ
झूठ,बेवफाई,बेईमानी, स्वार्थ के संग।
नम्रता चांडक 

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