रचना के विवरण हेतु पुनः पीछे जाएँ रिपोर्ट टिप्पणी/समीक्षा

विश्व गोरैया दिवस पर विशेष

परिदों की जिंदगी 

 

परिदों की दुनिया भी खुदा ने ,

                     क्या कमाल की बनाई है ।

पंखो में उड़ान भरी है अपार ,

                     आकाश से होड़ लगाई है ।।

 

और चल पड़ते है अपने पथ ,

                    जब सुबह की भौर आई है ।

इंसानों के पूर्वज बनकर

                    उठने की आवाज लगाई है ।।

 

बड़े अजीब है ये परिंदे भी ,

                 खुले आकाश में इनका राज है ।

इनको है भरोसा खुद परों पर ,

               अपनी उड़ान पर इनको नाज है ।।

 

कितनी प्यारी इनकी किलकारी ,

               कितनी मधु मीठी सी आवाज है ।

अंबर के अंतिम छौर के पथ तक ,

             कितनी दूरगामी इनकी परवाज है ।।

 

हो  जाए  हम भी परिंदो के समान ,

              आओ  भरे  अपने पंखो में उड़ान ।

कुछ  पल  के  लिए ही सही मगर ,

              आओ  भूल जाए अपनी पहचान ।।

 

उड़ते है  परिंदे कैसे   आसमान में ,

             होते है  कैसे मस्त अपनी उड़ान में ।

हम  तो बंद कमरों में जीते जिंदगी ,

             खुशी और गम  दब गये मकान में ।।

 

तिनको  तिनको  से घोंसला बनाना ,

             दिन रात मेहनत से घर को सजाना ।

रोज  सुबह  चल  देते  कमाने खाने ,

            दाने दाने लेकर बच्चों को खिलाना ।।

 

न आज की चिंता न  कल  का डर ,

             बिगड़ा  तो  फिर  बना लेते वो घर ।

हम स्वार्थी , प्रकृति  के दुश्मन बन ,

            उजाड़ रहे नन्हें जीवों का कैसे घर ।।

 

लेकिन हम सब  महामानव बनकर ,

             मानवता को कहीं ताक में रखकर ।

चले है वैज्ञानिक युग की नींव डाल ,

              प्रकृति प्रदत परिंदो को मिटाकर ।।

 

प्रकृति से हम , हम  से  बने प्रकृति ,

            न करें विरुद्ध इसके कोई अनुकृति ।

ये  भी  हमारा अभिन्न  अंग है सदा ,

            आओ बचाये  परिंदे बचाये प्रकृति ।।

 

मौलिक एवं स्वरचित सृजन 

लोकेश कुमार मीणा "आजाद"

बूँदी , राजस्थान ।।

टिप्पणी/समीक्षा


आपकी रेटिंग

blank-star-rating

लेफ़्ट मेन्यु