कविता
ये सन्नाटे का ध्वंध था जीवन में,
और मिल गया साथ तेरा जीवनभर का..
आज जैसे चमकी मेरी किस्मत की रेखा हे,
जो न कभी हमने सोचा होगा..
हर राह पर साथ चलेंगे कभी,
मिल गया सुमासन राह को,
राहगीर का साथ हो जैसे..
हम यहां नहीं होंगे जब भी,
तब भी एक तारा बन चमकेंगे ,
कोई और न देख पाए हमे,
हरपल साथ चलते जायेंगे..
तू महेसुस करना तेरी परछाई में,
हम हरदम नजर आएंगे..
तू हो मायूस कभी यादों में मेरी,
तेरे हाथों में मेरे स्पर्श का एहसास होगा..
तू बैठे एकांत में समुद्र किनारे जो,
में भीगी रेत बन पैर छू जाऊंगी..
हो जाए आंखे नम तेरी कभी,
में बारिश बन आ जाउंगी..
हम तो मिले अजनबी बन जिंदगी में,
आज अजनबी जीवनभर का साथ बने...
हेत..

