विषय माँ
# विधा कविता
# . शीर्षक माँ
माँ तुझ पर क्या रचूँ ?
तू तो स्वंय रचयिता हैं ।
तेरा संपूर्ण जीवन ही गीता है ।
तूही हमें अपने अन्दर अंकुरित करती है ।
सिंचती रहती अपने अन्दर ही हमारें तन-मन
सही आकार दे हमें जन्म देती है ।
पुनः लग जाती पूरे तन मन से हमें सिंचनें ।
अपने दिन रात का चैन संग सब कुछ छोड़,
हमारे पालन हेतु हो जाती है तत्पर ।
हमें हर पल जीवन का पाठ समझाती है ।
हमारी हर खुशियों से अपने दर्द में भी मुस्कुराती है ।
माँ तुझ सा कहाँ कोई दूजा है ?
माँ तूही नवाज तूही पूजा है ।
माँ तू बहती नदियाँ है ।
माँ तू स्नेह का समन्दर है ।
सारी सृष्टि तेरे अन्दर है ।
माँ तुझ से निकली हर गजल है ।
माँ तुझ में रची हर कविता है ।
तेरे ज्ञान के आगे कहाँ कोई जीता है ?
तेरी ममता का सुख अनोखा है ।
तेरे आँचल की छाँव के आगे जन्नत का सुख फीका है ।
तेरी मन्नतों से रचा अपना संसार है ।
माँ तू होली है ,तू दीवाली है ।
माँ तू है तो हर त्योहार है ।
वरना लगता जहां विरान है।
माँ तू है,तो हर एक दिन खास है ।
तुझ ही सारे रिश्तें,पूरी दुनियाँ का एहसास है ।
तेरी दुआओं सें हर पल बढता आत्मविश्वास है ।
पर अब दिल को कैसे समझाऊँ मैं ?
माँ तू" है "से अब "थी" बन गई ।
जाने क्यूँ सामने से अब बस तस्वीरों में सिमट गई ।
फिर भी लगता है क्यूँ तू आस पास है ।
शायद मेरे चेहरे ,मेरी आदतों में
अपनी याद दिलाते मुझमें ही सिमट गई ॥
कहते हैँ सभी,
माँ कभी छोड़कर कहीं जाती नहीं ।
वो रहती है हमेशा अपने बच्चों के ही आस पास ।
शायद अब इस कहानी के पात्र बदल गए ।
माँ तू मुझमें और मैं अपने बच्चों में परिणत हो गई ॥
निवेदिता सिन्हा
भागलपुर,बिहार
