देशभक्त
आज़ादी मिलती नहीं मांगने से
हक मिलता कई बार,
ज़िद पर अड़ जाने से।
फितूर चढ़ा था अपने हक का!
लौटाया नहीं उन्होंने,
चुराया था जो मेरे हिस्से का!
लड़ना शुरू किया तो विद्रोही,
नहीं लड़ा तो कायर!
हर बात पर बातें बनाती,
ये तो दस्तूर है ज़माने का!
लड़ूंगा भी हारू़ंगा भी,
रुकूंगा बस नहीं मैं,
जब तलक पा नहीं लेता,
आसमां, मैं अपने हिस्से का!
जोश है मुझमें आज यदि,
जड़ चेतन को झकझोरूंगा!
निकाल ना लेता पत्थर से पानी,
स्वेद रक्त; पानी सा बहाऊंगा!
नाम की है फिक्र किसको!?
यह तो बिन मांगा उपहार है।
अपने दम पर जो है पाया,
वही सच्चा पुरस्कार है!
देश के खातिर मेरा सर्वस्व,
हंसते हंसते निसार है!
निशी मंजवानी ✍️
