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विफलता की गाथा

टूटी हुई इमारतों के अवशेषों पर

उन्हें सिसकते देखा

कुछ कीमत थी उन सपनों की

जिन्हें ढहते देखा।


वो रात दिन एक एक कर जुटाते

अपने घरौंदे के तिनके

आज उनके घरौंदे के टुकड़े पड़े थे जमीन पर 

कुछ औंधे कुछ रौंदे ।


उन प्रयासों की विफलता के आंसुओं को देखा

चारो तरफ से झुलसती हुई बारिश को देखा

मूक निशब्द आवाजों की गहराइयों को समझा

उन बेबसों की बेबसी को पहचाना।


उद्विग्न हृदय सागर में

कुछ सपने हिलोरते 

परिणाम पहचान उन्हें टूटने से रोका

मेरी कलम ने आज शब्दों की पंक्तियों को टोका।

स्वरचित *काव्यांशी


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