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अहंकार

मन भरा हुआ अहंकार से
झूठे सत्य और प्रगल्भ कलाप से

जीवन रंगों की तरंगे विचलित हैं
दिखती छाया कालिमा काल की।

कब तक मौन रहूं निष्ठुर तम प्रयास से
कर्म प्रतिध्वनि लौटने को आतुर

अहंकार की जंजीरों से स्वयं मुक्त कर सकूं 
आत्म चेतना जागृत कर सकूं।

बल बस इतना मुझको दे दो मेरे आराध्य
अहंकार की बेल को समूल नष्ट कर सकूं।
स्वरचित *काव्यांशी



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