यादें
कविता
. ।। *यादें* ।।
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बालाघाट, वारासिवनी की ,
पढ़ी-लिखी ।
जबलपुर में ब्याही गई ।
जब भी वहां की याद आए,
बचपन में खो जाती हूं।
सोचती हूं ,किस्मत का क्या
खेल है।
हर किसी को अपनी बचपन
की यादों से दूर।
एक नई यादों को बनाना पड़ता
है।
मां की ममता ,पिता का
प्यार ,भाई का दुलार,वह कहां
है ,जो मेरे साथ था।
थोड़ी भी तकलीफ बर्दाश्त के
बाहर था।
आज मां बन के तकलीफों का
भंडार सहती हूं।
पर मां का वह प्यार, आज भी
नहीं भुला पाती हू,
चाचा- चाची ,दादा -दादी ,पड़ोस की वह बातें घर की वह यादें।
कुछ ना जाती मन से,
आज भी आती वह याद ,
........बार-बार।
स्कूल की वह यादें ,सहेलियों
का वह संग।
आंखों में वह झलकता सा,
नजर आता है।
आज भी वह बात याद आती है, बार-बार।
जब भी कोई लेता है नाम वहां
का,
याद ताजी हो जाती है।
दिल की धड़कनों की सांसे,
ताजी हो जाती है।
स्वरचित
वंदना सोनेकर /बोरीकर
जबलपुर । 7।
