कर्तव्य
| कविता |
कर्तव्य
⏰समय को ना मैं रोक पाऊं,
वक्त ऐसे फिसलते देखती हूं।
अपने कर्तव्य में बंधी मैं एक मां,
बेटी ,बहन खुद के लिए न,
समय निकाल पाती हूं।
सब कुछ हो कर भी ,
कर्तव्य की बेड़ी से बंधी,
संग अपनों के लिए जीती हूं।
उनके प्यार और ऊंचा उठाने के
लिए,
अपनी जिंदगी को खो दे ती हूं।
अधिकार तो है बहुत,
सपने देखने का,
पर पूरा न करने की सोचती हूं।
सपनों के आड़ में,
अपनों को ना खो दूं,
कर्तव्य को ना तोड़ दूं।
रोना आए भी तो आंसू
पोछ लू,
अपनों को ऊंचा उठाने के लिए।
रहा तो बहुत मिलती है पर,
कर्तव्य के संग जीती
हूं।
फैसले तो बहुत लिए पर,
रुक जाती हूं,
परिवार के लिए मैं ही तो हूं,
जो कर्तव्य को लेकर चलती हूं,
⏱️ समय को ना मैं रोक पाती,
वक्त तो ऐसे फिसलते देखती हूं।
(स्वयं रचित)
वंदना सोनेकर/ बोरीकर
जबलपुर
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