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समय

स्मृतियाँ  धूमिल हुई सी
कुछ यादें सूखे पत्तों में छुपी हुई,
परत धूल की हटते ही कुछ ताजी कुछ विस्मृत हुयीं
अनगिनत लहरें ठहर गयीं थी ,
अब फिर से उर्मिल ज्वार बनी,
मन उपवन में फिर गुंजरित मधुप ध्वनि,
दुख के मेघ अब बरस गए,
हृदय पटल भीग गया अमृत रस से,
जो बात अधूरी सी थी  कहने को,
समय ने मौका दिया फिर से कहने को।।।।।*काव्यांशी

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