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इतिहास पर कलमकारी

ऐतिहासिक स्मारक पर नाम लिख अपना

ये युव क्या जतलाते हैं?!

आकारों के भीतर चिह्न बनाकर,

कैसे पदचिह्न छोड़ जाते हैं।

कितने जतन ये इमारतें बनी,

कितने पवित्र भाव छुपे।

क्यों ये नादान समझ ना पाते,

क्यों संपत्ति रक्षा इनमें ना पनपे!?

सहेज कर जिनको रखने का जिम्मा,

वो ही स्वरूप बिगाड़ते हैं।

सरकारी संपत्ति को समझ लावारिस,

ये रौब बेवजह झाड़ते हैं।

अरे नाम लिखकर दीवारों पर,

इतिहास नहीं रचा करते हैं!

याद उनको ही करता है ज़माना,

जो परहित का साहस रखते हैं।

बनाना ही है तो स्वयं से बनाओ,

महल-मीनारें नहीं गर मुमकिन,

तो दुश्मनों के शवागार बनाओ!


निशी मंजवानी ✍️

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