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मेरी काव्यांजली

 

शीर्षक :-  "अनबनी चाँदनी।"

 

अनबनी सी चाँदनी, अनमना सा चाँद, 

रूखे से एहसास रहे ,रूठे से अरमान।।

 

कैसी है रूसवाई छाई, कैसी हैं न छाँव, 

धूप मे भी राहत नही तपता आसमान।।

 

वो फिक्र की बेसब्री , न जिक्र का एहसान, 

अनबनी सी चाँदनी, और अनमना है चाँद।।

 

ये इश्क है या मोहब्बत, या और कोई सिला, 

गुम होती आजादी , घुटन बनी कैद गाह।।

 

तसव्वुर का ख़्याल ख़्वाहिश मे जो बदला,

जो हुई न पूरी तो ले लिया बदला।।

 

ये कैसा दौर ए इश्क, चल पड़ा है दोस्तों,

हर जगह नींव मतलब की ,जो न रहा तो छोड़ दो।।

 

बेचारगी हावी, ऊंची उड़ान पर,

जो उड़ लिया अपनी मर्जी , तो कतर दिए गए पर।।

 

सुकून को बेसुकूनी, इतर रही इधर उधर, 

अनबनी सी मुई चाँदनी, अनमना सा चाँद बशर।।

=/=

संदीप शर्मा।।

देहरादून।

8909028043

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