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मीरा परिहार की पुस्तक श्रीमद्भागवत गीता काव्यांजलि से

श्रीमद्भागवत गीता का स्रोत और लेखक


पौराणिक संदर्भों एवं स्वयं महाभारत में ऐसा वर्णन आता है कि वेदव्यास जी ने हिमालय की तलहटी की एक पवित्र गुफा में तपस्या की और ध्यान योग में स्थित होकर महाभारत की घटनाओं का आदि से अन्त तक मन में स्मरण किया और महाभारत की रचना कर ली। परन्तु इसके पश्चात् उनके सामने समस्या यह थी कि इस काव्य के ज्ञान को आने वाली पीढ़ियों तक कैसे पहुंचाया जाए। वह चाहते थे कि वह बोलते जाएं और अन्य कोई बिना गलती किए लिखता जाए। आज के संदर्भ में हम कह सकते हैं कि उन्हें एक प्रतिभाशाली टाइपिस्ट की जरूरत थी। इसलिए वे ब्रह्मा जी के कहने पर गणेश जी के पास पहुंचे और उन्हें अपना मंतव्य बताया। गणेश जी लिखने को तैयार तो हो गये, किंतु उन्होंने एक शर्त रखी कि कलम एक बार उठा लेने के बाद कार्य समाप्त होने तक वे बीच में नहीं रुकेंगे। व्यास जी जानते थे कि यह शर्त बहुत कठिनाइयां उत्पन्न कर सकती है, अतः उन्होंने भी अपनी चतुराई से एक शर्त रखी कि कोई भी श्लोक लिखने से पहले उन्हें उसका अर्थ समझना होगा। गणेश जी ने उनका यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इस तरह व्यास जी बीच-बीच में कुछ कठिन श्लोकों को रच देते थे, तो जब गणेश जी उनके अर्थ पर विचार कर रहे होते उतने समय में ही व्यास जी कुछ और नये श्लोक रच देते। इस प्रकार सम्पूर्ण महाभारत तीन वर्षों के अंतराल में लिखी गयी।


इस काव्य के रचयिता वेदव्यास जी ने अपने इस अनुपम काव्य में वेदों, वेदांगों और उपनिषदों के गुह्यतम रहस्यों का निरूपण किया हैं। इसके अतिरिक्त इस  में न्याय, शिक्षा, चिकित्सा, ज्योतिष, युद्धनीति, योग शास्त्र, अर्थशास्त्र, वास्तु शास्त्र, शिल्पशास्त्र, खगोल विद्या तथा धर्मशास्त्र का भी विस्तार से वर्णन किया है। महाभारत कथा लेखन के अन्य मत भी हैं लेकिन हम यहाँ ज्ञान मार्गी होकर गीता ग्रंथ से लाभ ग्रहण करेंगे। जब सामने आम रखे हुए हैं तब पेड़ की खोज करने चले जाने का मतलब है कि हम आम की मिठास का अनुभव नहीं कर पाएंगे।

गीता का उपदेश महाभारत महाकाव्य का ही एक अंश है जो जन-जन में प्रचलित है। महाभारत पढ़ने पर यह कहा जाता है कि यह गृहस्थ को नहीं पढ़नी चाहिए क्योंकि इससे घरों में भी महाभारत शुरू हो जाएगी। लेकिन मेरा मत यह है कि हमें महाभारत भी पढ़नी चाहिए। इससे हमें उस समय की देश,काल परिस्थिति, आचार-विचार,शिक्षा, संस्कृति के बारे में जानकारी मिलती है। लेकिन अब वह ज्ञानपिपासू एवं शोधार्थियों तक ही सीमित है। लेकिन श्रीमद्भागवत गीता मानवोपयोगी आचार-विचार और व्यक्तित्व निर्माण के लिए हर गृहस्थ के लिए आवश्यक ग्रंथकी मान्यता प्राप्त कर चुका है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के श्रीमुख से अर्जुन को सुनाई जाने से श्रद्धा और भक्ति का स्रोत भी है।

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जब अर्जुन दुखी होकर अपने धनुष बाण रख देते हैं और युद्ध न करने की बात करते हैं। सभी योद्धा रणभूमि में आ चुके थे। अर्थात युद्ध करने का फैसला लिया जा चुका था। दोनों ओर की सेनाएं तथा समर्थन में आए अन्य राज्यों से भी आकर सेनाओं ने मोर्चा संभाल लिया था। तब श्रीकृष्ण ने दुविधा ग्रस्त अर्जुन को महाभारत युद्ध आरंभ होने के ठीक पहले भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया वह श्रीमद्भगवद्गीता के नाम से प्रसिद्ध है। यह महाभारत के भीष्मपर्व का अंग है। जिसके 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं।आज से लगभग 4500 वर्ष पहले गीता का ज्ञान बोला गया था।



सम्पूर्ण शास्त्रों में ईश्वर-तत्व ज्ञान के लिए श्रीमद्भागवत गीता जैसी कोई पुस्तक नहीं है। भगवान श्री कृष्ण ने इसमें तात्विक ज्ञान को संसार के समक्ष वर्णित किया है। माध्यम बनाया है अर्जुन को। जिसे युद्ध क्षेत्र में मतिभ्रम हो रहा था। अपने बंधु-बांधवों पर कैसे शस्त्र चला सकता हूँ। सही मायने में देखा जाए तो मानव युद्ध प्रेमी कहा जा सकता है। संसार में आयुधों का निर्माण और उनका विपरण युद्ध में प्रयोग हेतु ही होता है। एक जाति दूसरी जाति से विद्वेष करती है। अपना धर्म दूसरे धर्म से श्रेष्ठ समझने का भ्रम, एक देश दूसरे देश को हेय दृष्टि से देखता है,कोई स्वयं को श्रेष्ठ समझता है और अन्य को निम्न। इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए मानव सभ्यता ने अनेक युद्ध किए हैं और मानव को भयभीत अवस्था में पहुँचाया है। आज मणिपुर में दो समुदायों के मध्य संघर्ष इस मनोवृत्ति का गवाह है। कुरुक्षेत्र का युद्ध परिवार के मध्य था , इसलिए अर्जुन के हाथ कांप रहे थे और मन विचलित हो रहा था। जब कि एक योद्धा के लिए युद्ध एक पर्व होता है जिसमें अपने कौशल को दिखाने का अवसर मिलता है।

    दूसरा पक्ष यह भी है कि जहांँ मानवीयता , नैतिकता का ह्रास होता है और छल,कपट,लोभ,द्रोह,परधन हरण, स्त्रियों के शील भंग होते हैं तो युद्ध एक आवश्यकता बन जाता है। कौरवों और पांडवों के मध्य भी ऐसी ही स्थिति आ गयी थी। धृतराष्ट्र पुत्र पांडव पुत्रों को सुई के नोक के बराबर भूमि भी नहीं देना चाहते थे। इसके विपरीत उनकी मंशा उन्हें राज्य च्युत करने और वनों में ही जीवनोपर्यन्त भटकाने की थी। राजभवन में जुए में द्रौपदी का जीत लेना साधारण घटना नहीं थी। बड़े -बड़े ज्ञानी , योद्धा, राजा , महाराजा, पिता, पितामह भूल चुके थे कि वे पुत्र वधू के साथ क्या कर रहे हैं। सभी के लिए धर्म मात्र राज सिंहासन की रक्षा करना था। पुत्र वधू तो एक सामान्य नागरिक भी नहीं थी उनकी दृष्टि में। अधर्म की पराकाष्ठा पर कृष्ण को दखल देना पड़ा। युद्ध के माध्यम से अपना अधिकार लेने के लिए पांडवों को प्रेरित किया गया और परिणाम स्वरूप चतुरंगिणी सेना दोनों ओर से युद्ध के मैदान में आ डटीं। तब अर्जुन कहने लगे जिन भाइयों के साथ बैठकर भोजन किया है। जिन पितामह के स्नेह की छत्रछाया में अपना बचपन बिताया है। उनके सामने तीर लेकर कैसे खड़ा हो जाऊँ ? सखा कृष्ण मुझसे यह नहीं होगा। जिसे राज चाहिए वह उसे ले ले । पर अपने ही बंधु -बांधवों के साथ युद्ध! नहीं! नहीं! 

   कृष्ण तो कृष्ण ही थे । उन्होंने धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश का जैसे अपने जीवन काल में लक्ष्य बना लिया था। शास्त्र सम्मत पुराणों और उपनिषदों का ज्ञान उन्हें कंठस्थ था। वे अर्जुन को विश्वास में लेते हैं और धर्म सम्मत व्यवहार की विवेचना करते हुए समझाते हैं। जैसे अभिभावक अपने बालक को सही -गलत का अर्थ समझाते हैं।

आज हमारे समक्ष जो भगवद्गीता है वह संजय द्वारा धृतराष्ट्र को सुनाई गयी है। ऐसा कहा जाता है कि संजय को दिव्यदृष्टि प्राप्त थी । जिससे उन्होंने युद्ध भूमि का वर्णन धृतराष्ट्र को सुनाया था।


प्रथम अध्याय*


खड़े हुए रणभूमि में शूरवीर दोऊ ओर।

शंख, नगाड़े,ढोलों का शोर हुआ घनघोर।।


शोर हुआ घनघोर दुन्दुभि रण की बाजे।

लिए शस्त्र धनुर्बाण स्वजन को मारन काजे।।


अश्व श्वेत उत्तम रथ, है लगाम हाथ श्रीकृष्ण।

ताही रथ अर्जुन खड़े , लेकर हृदय विदीर्ण।।


लेकर हृदय विदीर्ण, सोचते प्रभु कैसी माया।

जो हैं मेरे बंधुजन , मैं उन्हीं को मारन आया।।


बजा रहे पांचजन्य कृष्ण, देवदत्त अर्जुन निपुण।

पौण्ड्र बजाया भीमसेन,अनंत विजय श्री युधिष्ठिर।।


सुघोष बजाया नकुल  ने,   मणिपुष्पक शंख सहदेव।

पांचों सुत द्रोपदी,सुभद्रा अभिमन्यु,शंख अनेकानेक।।


शब्द हुआ घनघोर, गूंजते धरती और अम्बर।

डटे वीर दोऊ ओर , परस्पर युद्ध को तत्पर।।


सगे बंधु और बांधव,खड़े देख हृषिकेश।

बोले अच्युत!अर्ज है!

अभिलाषी जो युद्ध के मैं देखूं उनके वेश।।


देखूँ उनके वेश, जान लूँ,युद्ध है किससे करना।

खड़े कौन रणक्षेत्र में,वध किस-किस का करना।।


किस-किस से करना योग्य है, युद्ध मुझे श्रीकृष्ण।

तीक्ष्ण वाणों से होंगे किसके , हृदय आज विदीर्ण।।


सुन विचार श्री कृष्ण किया,रथ रणक्षेत्र के बीच।

बोले ,सुन हे पार्थ! देख ले मैं रथ ले आया खींच।।


रथ ले आया खींच, देख हे अर्जुन! युद्धाभिलाषी।

खड़े हैं दोनों ओर , पराक्रमी,वीर, योद्धा,साहसी।।


देख युद्ध के लिए जुटे सब,कौरव बंधु-बांधवों को।

दादा-परदादा, गुरुओं, चाचा-ताऊ, पुत्रों-पोत्रों को।।


देख स्वजन समुदाय‌ सभी, शोक कर अर्जुन बोले।

हे केशव! मुख सूख रहा, हैं अंग शिथिल लगे होने।।


कांप रही यह देह, त्वचा भी लगती है जलती सी।

भ्रमित हुआ यह मन, प्रभु ,यह कैसी गलती की।।



नहीं चाहिए विजय राज्य ,न ही है मुझे चाह सुखों की।

जिन्हें अभीष्ट सुख ,वैभव,खड़े छोड़ आस जीवन की।।


हे मधुसूदन!


नहीं मार सकता मैं इनको, तीनों लोक मिलें तो भी।

मार सगे सम्बंधी बांधव, क्या तब हमें प्रसन्नता होगी।।


भ्रष्ट चित्त हो लोभवश ,न दीखे हानि हैं अभिमानी!

बिना विचारे खड़े हुए हैं, पुत्र-पितामह, गुरु-ज्ञानी।।


वे सब नहीं देखते कृष्ण !,कुलधर्म नाश से उत्पन्न दोष।

नाश हुआ कुल धर्म तो,फैलेगा कुल पाप नीतिगत रोष।।


बढ़ जाएगा पाप, स्त्रियां दूषित होंगी तब  हे मधुसूदन!

तर्पण से वंचित पुरखे होंगे, होगी अधोगति हे जनार्दन!


हाय शोक बुद्धिमान होकर हम ,महान पाप को तत्पर।

मात्र राज्य सुख लोभ वश,मारूँ उन्हें ? दीजिए उत्तर।।


ये रखा धनुष-बाण! नहीं मैं युद्ध न अब कर पाऊंगा।

यदि वे मारें मार दें मुझे, नहीं मैं युद्ध न कर पाऊंगा ।।


प्रथम अध्याय समाप्त,????????????


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