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बस चलता जा


चली ज़िंदगी हौले हौले,

मन की नैया इत उत डोले।


चंदा रुकता दिखा कभी ना,

रवि, मनमसोस भी निकले।


आश निराश का उतार चढ़ाव,

उम्र; वक्त का निर्णायक पड़ाव।


कभी चोट दे बढ़ने का सहारा,

नासूर बन जाता कभी है घाव।


वक्त धारा ना नयन सुख दायक,

छीन लेता सब,कभी तेज बहाव।


कहती है 'निशा' बस बढ़ता ही जा,

पीछे ले जाता, अतीत में झुकाव।


निशी मंजवानी ✍️

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