हां वो स्त्री गृहिणी है!
कभी आंगन बुहारती है,
कभी रंगोली से सजाती है
नींबू मिर्ची बांध डोर में
वो नज़र से सबको बचाती है....
आते जाते आवाज़ लगाता
हर कोई उसे पुकारता है,
वो दौड़ी दौड़ी आती है...
जूड़े से निकलते बाल कभी,
कभी चोटी बिखर सी जाती है...
समेटती रहती फिर भी घर को
सामानों की जगह बनाती है...
कभी गेहूं अनाज दाल लिए
आंगन में मेला सा करती,
कंकड़ पत्थर कांट छांट कर
वो दलहन को सहेज रखती है।
तितली सी मंडराती फिरती
हर कोना रंगीन है करती
निशां अपनी मौजूदगी का,
वो हर जगह छोड़ती है...
कभी रफू करती उधड़े वस्त्र,
गांठों को खोल सुलझती है
हां वो स्त्री गृहिणी है,
जो कुछ ना होकर भी बहुत कुछ है,
उपाधि तमगा ना पाकर भी,
सबका ह्रदय जीतती है....
