कैकयी
कैसा उर मे ताप, ह्रदय उस रहा निज, होगा,
हिय के टुकड़े को ,वन, जब कहा उस होगा,।।
भूलकर मर्यादा, वह किस राह, रही,उत होगी,
कहा वन- गमन , क्या ,वह रही,वही माँ होगी।।
बालपन मे ,राम ,आसक्त थी ,वह तब रहती,
हुआ क्या कि व्यथा ,आसक्ति की अब न वह थी।।
भरत को अपने भूल,राम अनुराग थी रखती,
कौशल्या विरक्त ,आसक्ति मे वह रत थी।।
भरत नन्दिनी को ,कलंक अब मथना होगा,
कलुषित कोलाहल, गरल ,चखना सब होगा।।
राज तिलक और राम , अरे यह क्या है हो रहा,?,
जीवन का तो न ,यह संवाद हो रहा।।
चिंतित दिखे देव ,सुने तिलक की बातें,
क्या होगा सुखदेव, गर फेंके गए न पासे।।
दौड़ लगाए देव ,आह्वान ,शारदे से कीन्हां,
करो न कछु तो माँ ,राम,का तिलक है जीम्हां।।
धरी हिय पर पीर, फेर मंथरा मन दीन्हा,
वही विष फिर देवन ,,ग्रहण कैकयी ने कीन्हा।।
कैसे प्रेम राग ,लपेट, वसन विष लीन्हा,
कोप भवन मे जा, रूप देवन हित कीन्हा।।
दो न दो वरदान, दशरथ तुमने थे जो दीन्हें ,
भरत को राज और पाट ,वन राम को दे दीजैं।।
अजानबाहू से संताप, कैकयी यह क्या तुम कहती
ले लो दशरथ प्राण,पर प्रण न लो यह सख्ती ।।
खूब मनाई भरत ,नन्दिनी, जी भरपाई,
पर होनी थी और, होनी थी ,खुद रघुराई।।
उल्ट दिए सब खेल,देख हित देव विधाता ,
पूत न हुआ कुपूत, माता, भई हुई कुमाता।।
चल दिए राह वन आप ,सहर्ष कैकयी हित कीन्हें,
हित था वह राम आप, बना जो राम रब दीन्हे।।
कैसा था अनुराग,राग सुत और माता मे,
साध लिए हित आप,दीन वसुधा माता के।।
वन खग,पंकज कीट ,चरण धीर धरा जब चूमें,
बिसराई सी पवन,राम पर, हर कण रीझें।।
इक इक कण वसुधा ,का, अतृप्त था जो झूमा,
राम राम श्रीराम, ह्रदय मे हर इक कीन्हां।।
कितने कौशल राम ,कौशल्या नंद किए थे,
न देती बनवास, कैकयी तो, व्यर्थ सिय थे।।
भक्ति की थी भेंट ,सहेज केवट थे लीन्हे,
दी उतराई देह ,पार पुश्त ,सात निज कीन्हें।।
तारना था अहिल्या ,शापित जो ,जड़ थी माई ,
और शबरी की भक्ति, राम,कर दी अगुवाई।।
था देना उत दंड ,दानव जो हुए थे भारी,
ताड़का , शूर्पणखा ,दशानन अत्याचारी।।
क्या मारीच विभीषण ,क्या सुग्रीव और बालि,
तार दिए हनुमान, संत सुत अंजना कुमारी।।
खेल खेल मे राम, राम ने वन था जीम्हां,
राम से हुए श्रीराम, सिय वर जब वन लीन्हा।।
इसी को कौतुक था ,कैकयी जो विधि रचाया,
पान किया विष दंश, द्वेष कलंक का पाया।।
ऐसा नही की जानती ,थी ,वह सब ही माई,
यह तो कौशल, राम ,कौशल्या नंद रघुराई।।
प्यासी रही बनवास ,दौरान जो भरत की जाई,
द्वापर मे थी लिए ,सभी वह प्यास मिटाई।।
बन यशोदा आप ,सुख सुत माधव लीन्हा,
तृप्ति की वो प्यास,कैकयी त्रेता जो लीन्हां।।
कैकयी का संताप ,कलुषित करता कुल कैसे ,
समझ सके कोई कौन, विधाता के वह पासे।।
जगत ने कैकयी माँ को ,दुख इतना था दीन्हा,
नाम तक न रखा ,सुता जो जननी जीम्हां।।
कैसा उर संताप ,राम सुत सहा सब होगा,
भरत से भी अलगाव, वर्ष भर रहा जब होगा।।
तब भी सुखी वह आप ,अंततः भरत की माई,
शापित उसके शाप से पूजे गए रघुराई।।
होता है वही आप जो रांचे विधि रघुराई,
कैकयी तेरा भाग्य, रहा भले दुखदाई।।
सब ही रचे श्रीराम, करे क्या ही प्रभुताई,
खेलों खेले खेल, जो खेले सरल रघुराई।।
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संदीप शर्मा सरल।।
देहरादून उत्तराखंड ।।
