रचना के विवरण हेतु पुनः पीछे जाएँ रिपोर्ट टिप्पणी/समीक्षा

मन की सच्चाई

।। *मन की सच्चाई* ।।

    -------------------------

मन की सच्चाई को कोई जान नहीं सकता ।

दिल की आवाज को कोई सुन नहीं सकता ।

सच क्या है ,केवल उसी को पता होता है।

जो कहता है, सोचता और समझता है।

फिर भी दिल की आवाज को    

             ना, 

बाहर निकलने देता है,

 ना कुछ कहता है ।

किसी को जानना ,

कितना कठिन होता है।

यह केवल वही समझ सकता है।       

        ना किसी का व्यवहार ,

        ना किसी की बातें,

 किसी की सच्चाई बयां करती ।

 वह तो सिर्फ बाहरी आवरन को देख,

 इंसान का निर्णय लेती है।

कितनी अजीब दुनिया है, 

पल- पल बदलती रहती है ।

वक्त रुकता नहीं और जुबा बदल जाती है ।

खुद की सच्चाई, 

         खुद को पता होती है ।

दुनिया को मूर्ख बनाते फिरते हैं,     

      ना वक्त से डर,

              ना हालात से, 

                       ना तजुर्बे  से।

मौसम की तरह रंग बदलना, 

    इंसान की फितरत में होता है। 

 वक्त देखते ही गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं।

 अपनी बात को सही करने,    

    किसी हद तक पहुंच जाते हैं। 

इसलिए कहा जाता है ,

   की मन की सच्चाई,

      दिल की बातें कोई नहीं समझ सकता ।

    बस वही जानता है,

जो उसे कहता , समझता 

               और बोलता है।

 

 । *वंदना  सोनकर /बोरीकर ।*

टिप्पणी/समीक्षा


आपकी रेटिंग

blank-star-rating

लेफ़्ट मेन्यु