मेरे आँगन चाँद खिला
मेरे आंगन जब चांद खिला
झुरमुटों के बीच से झांक रहा है चांद ,
दे रहा आज मेरे दिल को कैसे घाव ।
पिया मिलन आस से बैठी मैं उदास ,
विरह अग्नि जला रही कैसे बीते रात ।
दूध से नहा गई है आज कैसी चांदनी,
घिर रही बदली मन में स्याह रात की!
होता है क्यों आभास तेरे पदचाप का,
कब आयेगा वक्त अब मुलाकात का ?
थके नयन दर्श करें कैसे चांद का?
काटे नहीं कटता क्षण इंतजार का!
करता अठखेलियां चांद आंसमा का,
तपता हृदय अब रक्त लौह सा ।
बिखरने लगी रश्मियां अब मेरे मन में,
खिल उठी कलियां सूखे उपवन में!
बज उठा संगीत इस सुप्त साज से,
गा उठे भ्रमर गीत पुष्प बाग से ।
उड़ने लगी हवा संग मेरी ये अलकायें ,
सुरभित हो उठीं अब कैसी चहुं दिशायें?
मनमयूर भी अब नर्तन कर उठा,
मेरे आंगन जब चांद खिला !
रीता खरे
