વ્રજધારી
यमुना तट गोपिन आयीं,
स्नान करे उर शांत।
व्रत कर्यौ कटिन नियम सों,
मने राख्यौ अनंत॥
श्याम छुप्यो कदम्ब छाँव,
मन मं लीन्हो ठान।
चीर धर्यो, वृक्ष चढ़ायो,
बोल्यौ वचन महान॥
"नङ्गे जल मं प्रेम सुधा,
परछो मन को भेद।
शरम-गर्व तजि आवो हिय सों,
तभी मिलै मोर नेद॥"
गोपिन थर-थर काँप उठीं,
नेत्र भरे जल धार।
पर स्मरन भयो मोहन को,
मिट गयौ तन-आभार॥
हाथ जोड़ि करुणा करी,
“दियो चीर अब देहु।”
श्याम हँसे करुणा सों बोले,
“प्रेम सों मोहि लेहु॥”
