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आखिरी शाम

आखिरी शाम


उस आखिरी शाम में 

उदासी के झरोखों से 

मैं पूछ उठती तुमसे 

क्या मिल पाएंगे 

कभी फिर से 

जो भी बीता 

उन यादों की बरसात में 

भीगे हैं अब तक 

क्या लौटेगा गुजरा वह सावन 

सौंधी मिट्टी की खुशबू से 

फिर से महकेंगे घर आंगन 

सूरज चांद फैलाएंगे उजियारा 

निसर्ग की क्या पल्लवित होगी जीवनधारा 

प्रकृति का जो हुआ 

दमन अनवरत 

उसी की है यह परिणीति 

हर झलक 

इंसानों दे कर दी जो भूल 

वह सुधरेगी 

या अपनी दुनिया की 

आखिरी शाम धरती भुगतेगी


जयश्री तामने

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