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हम-तुम

मिले एक दूजे से, बनकर हम मुसाफिर।

बोलो क्या फर्क, हम दोनों में है फिर।

तुम जाने चले कहां से, 

मैं चलता जा रहा जाने कहां पे

हो जाएं गर हमराही हम तुम,

तो शायद मिल जाएगी मंज़िल।


क्षितिज ही तो है ठिकाना-

मिलकर भी जो मिलता नहीं।

आफताब तक पहुंचने का,

सिला कोई अच्छा भी नहीं।


क्यों ना राहों में चलते चलते,

कर लें इकट्ठे बहुत से किस्से।

सुन लें, कह लें, मन की बातें,

जाने वक्त कितना किसके हिस्से।


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