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गांधारी

गांधारी तुम बहुत प्रेरक हो,

कितना बड़ा बलिदान तुम्हारा!
क्या कमी थी तुममें!??? फिर भी

तुमने एक नेत्रहीन से विवाह किया!
सुबल पत्री थी! शकुनी की बहन थी!!
और उससे भी बड़ी महानता,
तुम्हारा पत्नीधर्म निभाने का तरीका,
वाह क्या निराला रहा!!
यदि पति नयन सुख नहीं ले सकता तो मैं कैसे!!??अद्भुत!!!
पर शायद अर्थ और भावार्थ में तुम भिन्नता नहीं कर पायी...
कि पति पत्नी सुख दुख के साथी होने के साथ-साथ,
एक दूसरे के पूरक भी होते हैं!!
जिसमें वो अक्षम था वो कमी 'तुम' पूरी कर सकती थी...
पर हाय रे! अंधभक्त पति धर्मिता..
कदाचित तुम्हारा 'दृष्टिकोण' सही होता!!पर अफसोस,....
और उस पर!!?
तुमने अपनी 'दृष्टि' को भी निष्क्रिय कर दिया!!
अब सौ पुत्रों के सुकृत्य, दुष्कृत्य, क्रियाकलाप, कैसे देखोगी!?
कभी सोचा.????
नहीं, तुमने बस एक ही धर्म निभाया; पतिव्रता का..
क्या प्राप्त हुआ अंततः उससे...
पुत्रों का विनाश, और युद्ध....
कदाचित देख सकती तुम अपने ही भ्रात को अपनी गृहस्थी पर घात करते हुए!
तो रोक सकती थी अनर्थ होते हुए!
कुंती की अनकही पीड़ा और अव्यक्त क्रोध...
हक छिन जाने का असहायपन...
उन पाँचों भाइयों की एकता! और बाद में निर्बलता.....
जब एक सबला को अबला सी स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया गया!!
किसने!???
तुम्हारे अंधे, पुत्र प्रेम ने, और पतिव्रत धर्म ने...
वाह ऐसी मिसाल कायम की पत्नीधर्म की, कि
तुम्हारी निष्ठा के समक्ष मस्तक झुक जाता है, पर मस्तिष्क के विचार फन खड़ा करके प्रश्नों के विष की फुहार करते हैं कि क्या, क्या तुम्हारी निष्ठा सफल रही...??
क्या 'दुशाला', तुम्हारी बिटिया ने भी यही सीखा होगा...???


तुम्हारा जीवन मुझे सदा प्रेरित करता है 

कि, किस राह पर ना जाने में ही हित है..

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