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मैं और मेरा बघीरा एक मौन रिश्ता, एक जीवंत आत्मीयता

शब्दों से परे जो रिश्ता हो,

वह शायद तुमसे ही सीखा मैंने,

मेरे मौन के हर कोने को

तुमने ही तो पढ़ा है, बघीरा।

तुम बोलते नहीं,

पर तुम्हारी आँखों में

भावों का एक पूरा आकाश बसता है।

कभी प्रेम की उजली धूप,

कभी शिकायत का छोटा सा बादल,

तो कभी गर्व की चमकती किरण।

सुबह जब हम भगवान को प्रणाम करते हैं,

तुम भी झुक जाते हो उसी श्रद्धा से,

मानो तुम्हें भी पता हो

कि हर प्रार्थना का रास्ता

उसी एक परम शक्ति तक जाता है।

भोजन के समय तुम्हारी वह प्रतीक्षा—

जब तक मंत्र न हो,

तुम्हारा निवाला भी अधूरा रहता है।

कौन सिखाता है तुम्हें ये मर्यादाएँ?

कौन भरता है तुम्हारे भीतर

इतना सहज संस्कार?

कभी-कभी तुम सचमुच

एक छोटे बच्चे जैसे लगते हो—

सबको बुलाया और तुम्हें नहीं,

तो तुम भी रूठ कर

अपने छोटे से कोप भवन में जा बैठते हो।

जब तक प्यार से मनाया न जाए,

तुम्हारा मन भी नहीं मानता।

मैं डाँट दूँ तो

तुम भाग कर अपने पापा की गोद में जा बैठते हो,

और अगर दोनों ने डाँट दिया

तो दादाजी की शरण में छिप जाते हो—

जैसे हर बच्चे को पता होता है

कि किसके पास जाकर वह सुरक्षित है।

नानी के कमरे में जाने से पहले

तुम्हारी वह हल्की-सी “नॉक नॉक”…

कितनी सरल, कितनी सुंदर

तुम्हारी यह समझ।

और जब मैं कोई गीत गाती हूँ,

तो तुम भी सुर मिलाने लगते हो—

कभी ऊँचा, कभी धीमा,

पर उसमें भी एक अपनापन होता है।

कार में बैठते समय

तुम्हारी आँखों में जो गर्व चमकता है,

जैसे कह रहे हो—

“अब मैं भी इस दुनिया की सैर पर जा रहा हूँ।”

तुम्हें देखकर अक्सर लगता है

कि तुम सिर्फ एक कुत्ता नहीं हो,

तुम प्रकृति की वह सहज आत्मा हो

जो अभी भी ईश्वर से जुड़ी हुई है।

हम मनुष्य तो भूल गए हैं

अपने भीतर की उस दिव्य शक्ति को,

पर तुम…

तुम अब भी उसी से जुड़े हो

उतनी ही सच्चाई से।

इसलिए बघीरा,

जब भी मैं तुम्हारी आँखों में देखती हूँ

तो मुझे वहाँ

एक जानवर नहीं दिखाई देता।

मुझे वहाँ

प्रेम दिखाई देता है…

निर्मल, निष्कपट और सच्चा।

और तब मन कह उठता है—

ईश्वर ने तुम्हें बोलने की शक्ति नहीं दी,

पर शायद इसलिए…

क्योंकि तुम्हारा मौन ही

सबसे सच्ची भाषा है। 🐾🌿

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