सोचा,, खत लिख दूँ
मेरे प्रिय,
खिला है गुलाब आज आंगन में,
सोचा महक तुम तक पहुँचा दूं।
याद आ रही थी तुम्हारी,
सोचा खत से तुम्हें जता दूँ।
बड़े दिन हो गए खबर ना कोई,
सोचा कुछ अपनी ही सुना दूँ।
तुम कैसे हो सच-सच कहना,
चिट्ठी में झूठ शोभा नहीं देता।
शहर में बस तुम ही हो अकेले,
या साथ तुम्हारे कोई और भी रहता?
यहाँ घिरी मैं बेशक हूं सबसे,
तन्हाई फिर भी सताती है।
खट्टी अनबन मीठी बातें,
रह रहकर बहुत रुलाती हैं।
अम्मा कहती गइया जनेगी बछड़ा,
मैं उनकी आश से सहम जाती हूं।
तुम बताओ तुमने क्या है सोचा?
आओगे इस सावन में, देना ना अब की धोखा।
आम टोकरी खेत से लाए थे,
बाबा व सबने मज़े से खाए थे।
उसकी मिठास भी फीकी लगी,
तुम जो ना चख पाए थे।
झुलसाती इस गर्मी में,
रसीले अमवा चैन दिलाते।
पर मुझको तब तक चैन नहीं,
जब तक तुम चेहरा ना दिखाते।
बहुत हो गई बात गाँव की,
तुम सुनाओ खबर कुछ अपनी।
खाना वक्त पर खाते तो हो?
क्या याद आती 'फुगनी' अपनी?
खत तो लिखकर भेज रही पर,
तुमने पता बदला तो नहीं....?
जवाब देना ज़रूर इस खत का,
मैं मिलूंगी डाकिये को सदा यहीं...
तुम्हारी 'फुगनी'
