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दुबारा नहीं जीना 💔

सुनो…

रोज़ आईने के सामने

अपनी सूनी आँखों में काजल लगाती थी…

नहीं, इसलिए नहीं कि आँखें सुंदर लगें,

बल्कि इसलिए—

कि उनमें बसी तुम्हारी तस्वीर को

काला टीका लग जाए…

और किसी की नज़र ना लगे।


रोज़ दरवाज़े की आहट सुनती थी…

कहीं तुम दस्तक दो

और मैं सुन ना पाऊँ…


चाँद से तुम्हारा हाल पूछने

छत पर जाया करती थी…

वो खामोश रहता,

और मैं उसे तुम्हारा जवाब मान लेती थी…


कहते हैं पतझड़ चार महीने का होता है,

पर मेरे जीवन का पतझड़

सालों तक ठहरा रहा…


सूखे पत्तों की चरमराहट को

मैंने साज़ बना लिया,

और उन्हीं सुरों पर

कितनी कविताएँ लिख डालीं…

हर कविता…

का सार…

बस तुम पर आकर खत्म हो जाता था…


आज…

आईने के सामने खड़े हो कर

मैंने आँखों में काजल लगाया…


तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई…

तेज़ हवा के साथ

कुछ सूखे पत्ते गुनगुनाते हुए

आँगन में आ गिरे…


मेरे लिखे हुए कविताओं के पन्ने

हाथों से फिसलकर बिखर गए…

तुमने एक पन्ना उठाया…

और मुस्कुराकर कहा—

"अपनी मोहब्बत… संभाल लीजिए।"


उस पल…

सदियों से दबी 

दो बूंदे आंखों के कोनों से 

गालों पर आ गई

सारा काजल बिखर गया ...😔


पलकों ने झपकना छोड़ दिया,

धड़कनों ने चलना…

और रूह—

जिस्म की कैद से निकलकर

नाच उठी…


जैसे सदियों बाद...

राधा ने कृष्ण को देख लिया हो…

शब्दकोश के सारे शब्द विलुप्त हो गए हो...

सिर्फ एक ही शब्द बचा था....प्रेम

वो प्रेम जिसकी परिभाषा तुमने सिखाई थी....


वो प्रेम जो पाने की जिद्द नहीं है..

जो अपना है ही नहीं ...

उसे पाने की कैसी जिद्द 

सिर्फ एक एहसास है जो 

मेरे भीतर समा चुका है...



पर आज ये पल…

शायद ठहरने के लिए नहीं आया था…

मेरी चौखट पर आने से पहले

कितना मंथन किया होगा

तुम्हारी भावनाओं ने—


मुझसे मिलना

अमृत था या विष…

नहीं पता…

पर तुमने पिया…

और चले आए…


तुम बहुत पास थे…

इतने पास कि

मेरी बिखरी लट को

कान के पीछे सरकाकर

नम आंखों से बस इतना कहा—

"तुम्हें देखने आया था… अब जा रहा हूँ।"


मैं दूर तक देखती रही…

जब तक तुम ओझल ना हो गए…

फिर खुद से कहा—

अब नहीं पुकारना…

ना रोकना है…

मुझे वापस नहीं जाना

उस मोड़ पर—

जहाँ से तुम मुड़ गए थे…


क्योंकि सच तो ये है…

मैं वहीं मर गई थी…

और जो आगे बढ़ी…

वो बस एक कल्पना थी…


अब मैंने  दुबारा नहीं जीना...😔

अब खुद को

एक सूखे पत्ते सा रहने दिया है—

जो शोर नहीं करता…

बस हवा के साथ बहता है…

और एक दिन

खामोशी से

मिट्टी में मिल जाता है…

गुलाब बनकर फिर से खिलने की चाह

अब मैंने छोड़ दी है…


तुम…

दुबारा वापस मत आना…

क्योंकि इस बार

मैं तुम्हें रोक नहीं पाऊँगी—

और शायद…

खुद को भी नहीं संभाल पाऊँगी।

बहुत मुश्किल से सीखा है

तुम्हारे बिना जीना…


तो शायद मैं

फिर से टूट जाऊँगी—

और इस बार

समेटने की हिम्मत नहीं बचेगी…

इसलिए…

तुम दुबारा वापस मत आना।


मै 'कल्पिता 'बन कर दूर आ चुकी हुं 

बहुत दूर...😔


कल्पिता 🌻



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