मैं अब भी ज़िंदा हूँ
शीर्षक: "मैं अब भी ज़िंदा हूँ"
मैं हर रोज़ मुस्कुराता हूँ,
पर मेरी मुस्कान में अब कोई घर नहीं बसता।
आँखें आज भी सपने देखती हैं,
मगर हर सपना सुबह होने से पहले मर जाता है।
लोग कहते हैं—
"समय सब ठीक कर देता है।"
शायद सच कहते होंगे,
लेकिन कुछ ज़ख्म ऐसे भी होते हैं
जिन्हें समय सिर्फ़ जीना सिखाता है,
भरना नहीं।
मैंने अपनों को बदलते देखा,
वादों को टूटते देखा,
और उन रिश्तों को बिखरते देखा
जिन्हें बचाने के लिए
मैंने ख़ुद को खो दिया।
अजीब बात है—
सबको मेरी हँसी याद रही,
पर किसी ने मेरी ख़ामोशी नहीं सुनी।
रात जब सारी दुनिया सो जाती है,
तब मेरा दिल मुझसे पूछता है—
"क्या सच में तुम ठीक हो?"
और हर बार
मेरी ख़ामोशी ही जवाब बन जाती है।
ज़िंदगी ने मुझे सिखाया है
कि मज़बूत वही नहीं होता जो रोता नहीं,
मज़बूत वह भी होता है
जो टूटकर भी
हर सुबह फिर से उठ खड़ा होता है।
अगर कभी मेरी कहानी लिखी जाए,
तो उसमें मेरी हार मत लिखना।
लिखना कि
एक इंसान था
जो हर दर्द के बाद भी
उम्मीद से मोहब्बत करता रहा।
क्योंकि कुछ लोग
जीते नहीं हैं ज़िंदगी,
वे हर दिन
अपने बिखरे हुए हिस्सों को जोड़कर
उसे फिर से बनाते हैं।
और शायद...
यही सबसे बड़ी जीत होती है।
