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अखबार

आज छपा था मेरी कविता,  अखबार में।

बहुत जल्दी ही छपा था मेरे विचार मे।

देखते ही मैं, खुशी से उछल पडा़।

मेरे लिए यह कार्य था बहुत बडा़.।

खुद को पाने लगा कवि अवतार में।

अभी यह क्षेत्र मेरा, बहुत ही लघु है।

जैसे नव वधू का कदम पडा ससुराल में।

आकाश के चमकते सितारों बीच खुद को पाया।

खुशी पाकर खुश होते वैसा मेरा मन भी हरषाया।

भले ही कवियों की गिनती अनगिनत संसार में।

कवियों से कवियों का आदर भले न हो।

चलेगा मेरे लिए यह सादर भले न हो।

मैंने भी है मन लगाया पाने को इस उपहार में।


गिरधारी लाल चौहान 

सक्ती छत्तीसगढ़ 

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