इश्क रहगुज़र गज़ल
गज़ल को मापे, मापनी वो बहर है।
ख्वाब को पूरा करने आती सहर है।
जीना चाहते जो जिंदगानी सुकूं से
टूटता क्यों उन पर अक्सर कहर है।
शिकवा, ग़मों से रहता है उनको
रोते, कहते ज़िंदगी को ज़हर हैं।
तेरे जाने के बाद भूल गए कि
लगती कैसी सुहानी सहर है।
तेरी ना मौजूदगी पर सवाल,
करता मुझसे ये सारा शहर है।
हँसी ने भी छोड़ दिया साथ मेरा,
इंतज़ार के अश्क आठों पहर हैं।
दर्द-ऐ-उल्फत लेकर भी 'निशी'
जाते क्यों इश्क की राहगुज़र हैं?
