रात
रुकी – रुकी सी चली
सांस हैं आजकी रात
तेरे ओंठों पे दबी
प्यार की एक मिठी सी बात ||1||
नज़र की बातें छिड़ी
अफसाना जैसे बन गया
आपके बाहों में आकर
दिल भी पागल पिघल गया ||2||
ये रात ना भुल पाएंगे कभी
मोहब्बत का इकरार चले
एक तुम, एक मैं
धुवां इश्क का बार– बार चले ||3||
मोहब्बत में डुबकर
चूर – चूर ओ कर गएं
बिन आपके जिना नहीं
दिल की गहराई से कह गएं ||4||
कु. मनिषा भिमराव बिऱ्हाडे/काव्य तारका
