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काली बदली

नील नभ  पर छाई

विपुल व्यापक काली बदली 

सावन बूंदों सी  आँखें भीगी 

मरू मरुस्थल हृदय उद्वेलित

प्रकृति बनी शब्दों की बोली



घन गरजे विद्युत चमके 

विटप पवन  मौन बहे

धरा ताप मुक्त बने

मानो जैसे

अवसादों का विप्लव 

दुख का झंझावात

बह जाने को तैयार।

स्वरचित~काव्यांशी श्रीवास्तवा

7/8/26


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