उपक्रम: सावन

सृजन शीर्षक- सावन
जब धरती तरसे, मेघा बरसे, चहुँ-दिशि सरसे, हरियाली।
सखि यह मन डोले, कोयल बोले, मधुरस घोले, मतवाली।।
मिल कजरी गाएँ, सब हरसाएँ, सुख है पाता, मन माली।
तरुणी ऊर्जामय, त्यागे सब भय, झृला झूले, तरु डाली।।
हरसाते जन-जन, सुरभित तन-मन, सुखमय जीवन, हो जाता।
लगता घर पावन, अति मनभावन,जब भी सावन, है आता।।
जलधर नभ अतुलित, जन-धन के हित, खुशी अपरिमित, बरसाता।
खेतों में पानी, जब मनमानी, कहाँ किसानी , रुक पाता।।
अति हर्षित झींगुर, मनमोहक सुर, नित उर झंकृत, कर गाता।
पनपे हैं तृणदल, कितने कोमल, वर्षा का जल, मन भाता।।
बारिश का मौसम, बरसे झमझम, दृश्य मनोरम, हर्षाता।
मन मधुकर जैसा, हर क्षण ऐसा, लगता कैसा, मदमाता।।
डॉ. कनक पाणि
