रचना के विवरण हेतु पुनः पीछे जाएँ रिपोर्ट टिप्पणी/समीक्षा

पूनम का चांद

पूनम का चाँद आज आसमान पर खिल रहा है,
और मेरा चाँद मुझसे रूठ कर कहीं छिपा बैठा है।

जैसे समुन्दर की लहरें मचलती हैं चाँद को पाने को,
वैसे ही मेरा दिल तड़प रहा है तेरे दीदार को।

यह धरती, यह हवाएँ सब जानती हैं मेरी खामोशी,
अब तू भी समझ ले, ना कर ऐसी दिल्लगी।

आसमान का चाँद कल फिर उभर आएगा और ढल जाएगा,
पर इस बेबस दिल को तुम्हारे बिना कौन संभालेगा?

छोड़कर यह बेरुखी लौट आ मेरी जिंदगी में,
इस चाँद की रोशनी में लेले मुझे अपनी आगोश में।

@नयना 

टिप्पणी/समीक्षा


आपकी रेटिंग

blank-star-rating

लेफ़्ट मेन्यु