प्रकृति की विनती
तुमको मैंने फूल दिया,
तुमने गंध ले कुचल दिया!?
छायादार वृक्ष दिया,
कुठार वार से काट दिया!?
जल दिया, जीवन दिया।
तुमको संसाधन संपन्न किया।
तुमने इसके स्त्रोतों को भी,
विषाक्त व मलिन किया!?
पर्वत खड़े थे जो शान से,
तोड़ दंभ उनका चूर किया।
आश्रित थे जिसपे जीव तरु,
निराश्रित उन्हें बेघर किया।
मैं समझी थी मेरे बालक,
संपत्ति को संजोएंगे।
दिया जो एक उन्हें कभी,
दुगुना कर दिखाएंगे।
पर 'मां' के प्रति देख व्यवहार,
मेरा ह्रदय भय से कंपित है।
नष्ट करने का निश्चय कर चुके,
वर्षों से श्रम कर जो संचित है।
माना मात का प्रेम बिन शर्त का,
पर क्या तुम भी अंश ना उनका!?
संतति हो कुछ नेह तो दिखलाओ,
मेरी करुणा पर कुठार न चलाओ।
