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प्यारी सी बातें

वह चुपचाप अपने कमरे में सो रही थी।रात को आये हवा के झोंके से उसकी नींद उड़ गई।वह उठी और घर की खिड़कियां बंद की। रात के एक बजे थे ,वो डाइनिंग रूम की ओर बढ़ी ,उसकी दादी आराम से सो रही थी।फिर वो उन सीढ़ियों से धीरे -धीरे ऊपर छत की ओर बढ़ी।उसकी पायल की छम - छम से भी उसकी दादी नहीं जगी।उसने सीढ़ियों से छत का दरवाजा खोला और इधर -उधर देखने लगी।

एकदम से वो उसके पीछे आया ,वह चौंकी नहीं बल्कि हंसने लगी।

छत पर स्ट्रीट लाइट की और चांद की धीमी रोशनी आ रही थी लेकिन उन दोनो के लिए ये काफी थी। दोनों छत पर रखी दो कुर्सियों पर बैठ गए और सामने के मैदान को देखने लगे।

रजनी - "जानते हो तुम,कब से इंतजार कर रही थी।"

 लोकेश - "मै तो पागल हूं जो कबका चौकीदार की तरह छत पर पहरा दे रहा था।तेरी पायल की छम -छम सुनी तो सुकून आया।"

रजनी मुस्कुराकर अपने पावों की ओर देखने लगी और बोली,"सुकून क्यू नही आयेगा ये तुमने ही तो दी है।"

लोकेश -"एक बात बताओ ,,कब तक हम यूं रातों को छिप कर छत पर मिलते रहेंगे ?"

रजनी - "जब तक घरवाले हमें स्वीकार नही कर लेते। अच्छा एक बात बताओ कि मैं कैसी लग रही हूं।"

लोकेश - " तुम मोटी हो गई हो,थोड़ा कम खाया करो और तुम्हारी आंखों के नीचे कालापन आ गया है,नींद पूरी किया करो।जाओ अब सो जाओ।"

"मै नीचे नहीं जाऊंगी, नहीं सोना मुझे।थोड़ा सा सुकून मिलता है तुम्हारे साथ लेकिन तुम हो कि भगा रहे हो।" रजनी ने उदास हो कर कहा।"

तभी हवा तेज चलने लगी।लोकेश ने छत पर रखी बजरी का एक टुकड़ा लिया और खड़ा हो कर दूर फेंका।वह तालाब के पानी में गिर गया।रजनी भी ऐसे ही करने लगी।मेरा दूर गया,मेरा ज्यादा दूर गया ऐसे ही दोनों आपस में लड़ने लगे।

तभी किसी ने रजनी को जोर से पकड़ा और उसके हाथ से बजरी ले ली।

"पागल हो गई हो जो यहां अकेली छत पर बजरी को फेंक कर बच्चों की तरह खेल रही हो वो भी रात के ढाई बजे,,,,,अकेली बड़बड़ किए जा रही हो।मैने कितनी बार कहा कि दादी के साथ सोया करो।अब नीचे चलो।"

रजनी के पिता ने गुस्से से कहा।

सारा परिवार छत पर मौजूद था।

"मेरे साथ यहां पर लोकेश था"रजनी ने कहा।

उसके पिता ने उसे एक थपपड़ मारा  और हाथ पकड़ कर नीचे ले आए।उसकी मां और दादी बेड पर उसके पास बैठ गई।

"लोकेश मर चुका है,तुम्हारा दिमागी संतुलन ठीक नहीं तभी तुम ऐसी हरकतें करती हो।

अब से आप दोनो इसके पास रहना,इसे नींद में चलने की बिमारी है,कल सुबह ही डॉक्टर से मिलते हैं।"रजनी के पिता ने कहा।


"डॉक्टर से कुछ नहीं होगा , मै जानती हूं ये उस मरे हुए लड़के की आत्मा से बात करती है।"दादी ने कहा।

"ओह मां जी,,,प्लीज सो जाइए और इस तरह की बहकी बातें मत कीजिए।"कहकर उसके पिता अपने रूम में चल दिए।

रजनी की मां ने उसे पानी पिलाया।उसके आंसू पोंछे ।फिर मां और दादी बेड पर उसके पास ही लेट गई।

रजनी सोच रही थी कि ऊपर छत पर यदि लोकेश नहीं था तो उसका भूत ही सही लेकिन उस भूत से बात करके थोड़ा सुकून तो मिला।काश मैं भी भूत बन कर अपने प्यार तक पहुंच जाऊं। ऐसे ही लोकेश के बारे में सोचते हुए रजनी नींद के आगोश में आ गई।


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