दो बाल्टी पानी
"अरे हट, मेरी बारी है! बड़ी आयी नंबर लगाने वाली।"
धक्का देते हुए मोहल्ले की 'अप्सरा ताई' ने 'गुलनार' की बाल्टी और गुलनार दोनों को धकेल दिया।
"आहउच...आह! झगड़ा क्यों करती हो बस 'दो बाल्टी' पानी ही तो भरना है। और अब तो मेरा नंबर था पानी भरने का!" गुलनार ने गिरकर संभलते हुए चिढ़ते हुए कहा।
ज़ोर से ठहाकों की आवाज़ गूंजने लगी। गुलनार स्तब्ध सी खड़ी हो हैरानी से उन्हें देख रही थी। आखिर ऐसा भी क्या कह दिया उसने.. इतने में,
"ये देख लो! एक और नंबर वाली आ गई मोहल्ले में" कहते हुए फिर मज़ाक बनने लगा गुलनार का। लोगों के भिनभिनाहट की आवाज़ उसे सचेत कर रही थी "ये देखो जंगली मुर्गी, ताई से पंगा ले रही है"
कोई कह रहा था "अप्सरा ताई के स्वर्ग में आकर उन्हीं से लोचा!"
फिर कहीं से किसी ने कहा "तरेगी नहीं तरसेगी, अगर ऐसे ही अकड़ में रही तो!"
दुख, गुस्सा, मजबूरी मिश्रित होकर पलकों पर आकर ठहर गए "नहीं ऐसे हार नहीं मान सकती, आखिर यहीं रहना है." सोचते हुए फिर उसने विनम्र भाव अपनाते हुए 'अप्सरा ताई' को बड़े आदर भाव से मनाते हुए कहा-
"देखो भूल चूक माफ करो ताई, मुझे बस दो बाल्टी पानी भर लेने दो वरना मुझे देर हो जाएगी।प्लीज़ ताई...."
गुलनार को यूं मिमियाते देख आखिरकार ताई को सुकून मिला। वरना चार दिन हो गए बस्ती में आए और ये लड़की आकर हाजिरी लगाना, मिलना तो दूर, उसी से भिड़ जाए!
अब ये तो ताई के शान के खिलाफ था। अब चूंकि उसके अहम को किसी ने बढ़ावा दे दिया तो शायद वो गुलनार पर तरस खाकर उसे पानी दे सकती है...
ताई के चेहरे के बदलते हाव-भाव देख गुलनार को लगा शायद उसका काम हो जाए.. आखिरकार थोड़ी नाक रगड़ने पर उसकी अर्ज़ी कुबूल हो गई और उसे मिल गया 'दो बाल्टी पानी'।
निशी मंजवानी ✍️
